The Degree System

Fractal Abstract Background

Spiritual progress doesn’t really unfold in starting and stopping points, like stops on a bus route.  Spirituality ebbs and flows like the tides, in keeping with the seasons of life and external pressures and rewards.  Infinite mystery does not respond to human categorizations, and yet we must make some concessions to our mortal minds, which frame reality in conceptual terms.  For this reason, adepts in various spiritual traditions have created orders and ranks to bring discipline and establish benchmarks for progress.  Without degrees and orders, discipline happens only haphazardly.  Without sure discipline, the spiritual life unravels.  So the esoteric society begins from the solid foundation of discipline.

Each degree comes with certain marks, which should be viewed as goals that the practitioner seeks to attain and as outward signs which show that the degree has been obtained.  Only a wise spiritual preceptor can discern whether the disciple has truly mastered the rank, and tests may be put into place to gauge the readiness of the disciple.  Such tests should not be punitive, like the hazing practiced by fraternities in the universities, and neither should they be mere bureaucratic formalism.  The tests may take the form of prayers and rituals to be completed, spiritual disciplines to be practiced, or some form of charitable giving or service.  Tests should be tailored to the life of the individual practitioner and the circumstances of that person’s life.

Those holding higher ranks should under no circumstances belittle or feel themselves superior to members of lower ranks.  Indeed, quite the opposite: those in the “higher” ranks should regard themselves as the servants of those in the more exoteric ranks.  The higher ranks exist in order to facilitate the spiritual progress of those in the lower ranks.  Indeed, the terms “higher” and “lower,”  “inner” and “outer” lose all meaning in the spiritual life, as all great teachers realize.  As Jesus said, “the first shall be last and the last shall be first.”  Think of how a parent takes care of a small child: feeding and clothing the child, holding her hand across the street, and preparing for her future.

 

 

No matter how many precautions are taken, it may occasionally happen that someone may be able to “game the system” and move up the ranks without the requisite attainments.  Rank preceptors should make every effort to ensure that this does not happen by preventing initiation of unqualified candidates.  Of course, people are multi-faceted, and the preceptor may see some hidden qualities in the candidate for initiation that are not visible to the naked eye.  Brothers and sisters in the Satsanga should avoid second-guessing the decisions of a preceptor and take that person’s flaws as themselves a form of spiritual testing.  Just as we learn in the esoteric ranks to regard the guru as God, so we ought to regard each other as gods as well, in order to prepare for knowledge of the Unfathomable.

A word about secrecy is also in order.  The Society does not require secrecy: only circumspection.  It would not be advantageous for practitioners to mention their membership in the Society to skeptical, cynical onlookers who have no belief in personal transformation.  Likewise, the degrees of the Society should not be paraded as resume items.  To gain material advantage or the esteem of others from them undermines the entire purpose of the Satsanga.  Members may divulge their rank if asked but should avoid doing so simply for personal gain.

On the other hand, as you progress through the ranks, you may find among your friends and acquaintances people with superior qualities who would make good candidates for membership.  You may speak to them about the Satsanga and refer them to the Inquirer’s Pamphlet or website.  Notice that this differs from the Christian practice of evangelism, which uses pressure tactics and guilt in order to swell the ranks of the Church.  If the Society functions as it should, it will grow, but, especially in this Kali Yuga (Dark Age), growth for the sake of growth should be avoided.

Under no circumstances should communication among members of different ranks be forbidden or discouraged.  Members of all ranks should regard themselves as equals, since only one divine nature pervades all things and all persons.  Ranks encourage each member to pursue his or her greatest excellence and not to lord that rank over others.  Think about the runners in a marathon in a big city.  Some may be running their first long-distance race, others may be shooting for a personal best, and still others are competing for a huge purse.  Each runner may be said to have succeeded on the terms appropriate to each.

डिग्री सिस्टम

आध्यात्मिक प्रगति वास्तव में आरंभ और अंत नहीं होता, और एक बस जैसा रूक रुक कर नहीं चलती। आध्यात्मिकता ज्वार के तरह बहती है, जीवन का मौसम, बाहरी दबाव और पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए। अनंत रहस्य मानव वर्गीकरण का जवाब नहीं देता, फिर भी हमें अपने नश्वर मन को कुछ रियायतें देने चाहिए, जो वास्तविकता को विचारधारा देता है। इस कारण से, विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं में मानक के प्रगति के लिए आदेश और अनुशासन लाया गया। डिग्री और आदेश के बिना, अनुशासन केवल संयोग से होता है। सुनिश्चित अनुशासन के बिना, आध्यात्मिक जीवन सफल नहीं होता। तो गूढ़ समाज, अनुशासन की ठोस नींव से शुरू होता है।

प्रत्येक डिग्री कुछ निशान के साथ आता है, पेशेवर को इस निशान को लक्ष्यों के रूप में देखना चाहिए जो प्राप्त करना चाहिए और यह निशान डिग्री प्राप्त करने का संकेत है। एक बुद्धिमान आध्यात्मिक गुरु विचार कर सकते हैं शिष्य को सही मायने में शिक्षा समाप्त हुआ या नहीं, परीक्षा लेते हैं शिष्य की तत्परता नापने के लिए। इस तरह के परीक्षा, दंडात्मक नहीं होना चाहिए जैसे की विश्वविद्यालयों में किया जाता है,   और न तो कोई नौकरशाही रीतिवाद होना चाहिए। परीक्षा पूजा और अनुष्ठान का रूप ले सकता है, आध्यात्मिक विषयों की अभ्यास भि किया जा सकता है, या धर्मार्थ देन या सेवा के कुछ कर्म के रुप ले सकता है। परीक्षा  एक व्यक्ति के जीवन और उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।

उच्च स्थान धारण करने वाला सदस्यों किसी भी परिस्थिति में किसी को  छोटा  न करें,  निचले स्थान के सदस्यों के सामने खुद को बेहतर महसूस न करें। दरअसल, काफी विपरीत होना चाहिए: “उच्च” स्थान के सदस्यों निचले स्थान के सदस्यों के सेवक के रूप में खुद को मानना चाहिए। उच्च स्थान निचले स्थान के  सदस्यों के आध्यात्मिक प्रगति की सुविधा के लिए मौजूद हैं। सभी महान शिक्षकों को मानना हैं की वास्तव में, शब्द जैसे की “उच्च” और “निचले”  “बाहरी” और “आंतरिक” आध्यात्मिक जीवन में सभी अर्थ खो देता है। यीशु ने कहा, “पहले पिछले होंगे और पिछले पहले हो जाएगें।” सोचिये, कैसे एक माता पिता अपने छोटे बच्चे की देखभाल करता है:  बच्चे को भोजन और वस्त्र देतें, सड़क पार होते समय उसका हाथ पकड़तें, और उसको उसकी भविष्य के लिए तैयार करतें।

table of rank relations hindi

कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने सावधानियाँ लिया जा रहा है, कभी-कभी कोई चतुर प्रणाली से और अपेक्षित योग्यता के बिना श्रेणी के ऊपर के स्तर पर पहुंच जाते हैं। स्तर प्रशिक्षक को हर अयोग्य उम्मीदवारों की दीक्षा रोकने का सुनिश्चित  प्रयास करना चाहिये। बेशक, लोगों बहुआयामी होते हैं, और प्रशिक्षक दीक्षा के लिए उम्मीदवार लोगों में कुछ छिपे गुणों को देख सकते हैं जो नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता है। सत्संग के भाई-बहनों को उनके प्रशिक्षक के निर्णयों पर संदेह न रख कर खुद की  खामियों को आध्यात्मिक परीक्षण के रूप में देखना चाहिए। हम गुरु को भगवान के रूप में देखना सीखते है, तो हमें एक-दूसरे को भि देवताओं के रूप में देखना चाहिए, अगाध ज्ञान के लिए तैयार होना चाहिए।

गोपनीयता के बारे में कुछ शब्द। समाज को गोपनीयता की आवश्यकता नहीं है: केवल सावधानता की आवश्यकता है। अभ्यासियों को लाभप्रद होगा निंदक दर्शकों उल्लेख करना की यह इस समाज के सदस्य है। इसी तरह, समाज के  डिग्री को संक्षिप्त विवरण के रूप में पेश  नहीं करना चाहिए। सामग्री लाभ या दूसरों के सम्मान हासिल करने का उद्देश्य सत्संग का पूरा उद्देश्य नष्ट करता है। यदि श्रेणी सदस्यों को घोषणा करने की आदेश करते है तो सदस्यों घोषणा कर सकते है व्यक्तिगत लाभ के लिए ऐसा नहीं करना चाहिए।

दूसरी ओर, आप श्रेणी के माध्यम से जेसे जेसे प्रगति करगें, आप अपने मित्रों और परिचितों के श्रेष्ठ गुणों के साथ परिचित होगें और उन्हें अच्छे उम्मीदवार बना सकते हैं। आप सत्संग के बारे में उनसे बात और अनुसंधान पुस्तिका या वेबसाइट देखने के लीए बोल सकते हैं। यह प्रचार कार्य ईसाई अभ्यास से अलग है, जो दबाव की रणनीति और अपराध का उपयोग करता है चर्च के श्रेणी उभार ने के लीए। समाज के कार्यों यदि इस रूप में चलता रहे तो, विकस होगा, लेकिन, विशेष रूप से इस कलयुग (अंधेरे उम्र) में, केवल विकास की खातिर वृद्धि से बचना चाहिए।

किसी भी परिस्थिति में विभिन्न श्रेणी के सदस्यों के बीच संचार रोकना नहिं चाहिए। सभी श्रेणी के सदस्यों बराबर हैं, क्योंकि केवल एक दिव्य प्रकृति सभी चीजों और सभी व्यक्तियों में व्याप्त है। श्रेणी प्रत्येक सदस्य को अपनी  उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं श्रेणी या प्रभु को लिए आगे बढ़ाने के लिए नहीं। एक बड़े शहर में एक मैराथन धावकों के बारे में सोचो। कुछ अपने जिंदगी कि पहले लंबी दूरी की दौड़ रहें हैं, दूसरों निजी अच्छे स्तर के लिए कोशिश कर रहें हैं, और दूसरों विशाल धन के लीये प्रतिद्वंद्विता कर रहें हैं। प्रत्येक धावक प्रत्येक के लिए उचित शर्तों पर सफल हो रहे हैं।

Hindi Trans. by Maitrayi 9/10/15